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सोमवार, 30 दिसंबर 2019

'एक डंडा, एक टायर'


बचपने की वो सारी बातें अक्सर निराली सी लगती है, जो आज के दौर के बचपने में देखने को नहीं मिलती है।आखिरकार याद भी तो वही आता है ना, जो आस-पास नहीं होता है।

गांव से शहर कि तरफ आए मुझे तकरिबन १९ साल हो गए हैं, पर आज भी वो गांव में खेतों के बीच बनी पगडंडीयों (मेेड़ों) को नहीं भूल पाया हूं मैं। तपतपाती गर्मी में पड़ने वाली बारिश कि वो पहली बूंद खेतों का श्रृंगार कर जाया करती थी और सूरज की अग्नि पर पानी डालकर कभी कभार नीले आसमान में इन्द्र धनुष के सातो रंग यूही बिखर जाते थे।

लंगोटीया यारों की टोली कभी 'जय कन्हैयालाल कि' के नारे लगाती तो कभी खेल-खेल में 'बर्फ-पानी' बन जाया करती थी। सभी को बर्फ़ बनना पसंद था क्योंकि तब तक हम में से किसी ने भी बर्फ़ नहीं देखी थी। फ्रिज और रंगीन टीवी अभी तक नहीं पहुंचे थे मेरे गांव में, वैसे भी इनका करना ही क्या था क्रिकेट मैच, समाचार और गाने इन सब के लिए रेडियो और फिल्म के लिए दूर बाज़ार में सिनेमाघर तो था ही।

बेपरवाह बचपन में कभी किसी शहरी चाचा या चाची से सुनते थे मोबाइल फोन के बारे में तो जो सच्चाई देखी नहीं होती थी, उसे झुठला दिया करते थे और भविष्य में एक दूसरे को देख कर बातें कर सकेंगे (वीडियो काॅलिंग) जैसी तमाम वैज्ञानिक बातों को शहरी भाई के मुंह से सुनकर उसे मन ही मन पागल धोषित कर दिया करते थे।

रात में खुले आसमान के नीचे खटिया लगाकर तारे गिनने का काम मेरा ही था। कभी किसी तारे में दादाजी तो कभी दादीजी नज़र आती थी। उनके बीच 'हेड लाइट' जैसा चांद कभी पूरा, कभी आधा, तो कभी गायब ही रहता था।

सूर्य कि पहली किरण के साथ ही "चलोगे?" हां! "उठो फिर उठो", 'तुम्हारे लिए भी लोटा में पानी ले लिए हैं'।
सुबह- सुबह ही लंगोटिया यारों कि लोटा पार्टी खेतो को खाद देने पहुंच जाती थी। तब क्या ही पता था कि खुले में शौच नहीं करना चाहिए। और वहीं पर बैठे बैठे पूरे दिन का रूट भी बन जाता था, टायर गाडी का। क्योंकि छुट्टीयों का समय था और पूरे दिन के लिए हम सभी उस पुलिस वाले कि तरह थे, जिसका काम सिर्फ घुमना होता है बाकि उसके विषय से बाहर की बात होती है।

नहाया, खाया और चल पड़े बर्दवारी (जहां पर पशुओं को पाला जाता है) कि ओर जहां पर भूषे के ऊपर पड़ी काली, गोल, साईकिल का पुराना टायर और साथ ही में भूसे के अंदर छुपा के रखी लतेर कि लकड़ी को निकालते हुए, एक दो बारी झाड लगा के भूषा हटा दिया करते थे। और फिर एक हाथ में डंडा और दूसरे हाथ में टायर लिए ड्राईवर साहब तैयार हो जाते थे। टायर और डंडा की यह गाड़ी कभी मेरे लिए जीप, टाटा सोमो, तो कभी ट्रैक्टर बन जाया करती थी।

बर्दवारी से बाहर निकलते ही नज़रे पलटन के दोस्तों को खोजती थी, कुछ तैयार खड़े होते थे अपने घर कि चौखट पर तो कुछ अभी भी नज़र नहीं आ रहे होते थे। हमारी पलटन उसका राष्ट्र गान कुछ ही शब्दों का था बस 'हिंदी की किताब कहां है?' 'यहां है! यहां है!' 'अभी ठूंठ रहा हूं' ( यानि कि तैयार हो रहा हूं)।

इंतज़ार में अपने-अपने घर के मुहाने पर खड़े होकर, घर के बड़े बुजुर्गो कि निगाहों से बचती हुई हम सभी कि निगाहें एक दूसरे से इसारो-इसारो में ही बातें करने लगती थी। फिल्मों में देखे गए जासूसों के सारे पैंतरों को, उस झड भर में आज़मा लिया जाता था।

सब तैयार थे, हाथ में टायर और डंडा लेकर, इंतज़ार तो बस अब "हिंदी कि किताब ले आओ' शब्द को सुनने का था। और यह शब्द कहने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ पलटन के सरदार का था जोकि एक दिन पहले हुई टायर गाड़ी कि दौड़ को जितने वाला व्यक्ति होता था।

'हिंदी कि किताब ले आओ' सूनते ही दाहिने हाथ से टायर को जमीं पर रख कर, उसे आगे कि तरफ एक घक्का देते हुए बिल्कुल उसी तरह जैसे कि हम आजकल गेमिंग जोन में 'पिटस्टाॅप बोलिंग' करते हुए उस वज़न दार बाॅल को आगे फेकते है गोल पोस्ट कि तरफ, फिर बाएं हाथ से दाहीने हाथ में लतेर कि डंडी को थामते हुए टायर कि रफ्तार से रफ्तार मिलाते हुए दौड़ पड़ते थे, वो नंहे पैर।

फिर आहिस्ते से लतेर कि लकड़ी से टायर पर जोर लगा दिया करते थे, वैसे ही जैसे कि एक किसान अपने बैलों को हाकता है लकड़ी कि छड़ी से। जैसे-जैसे टायर आगे बढ़ता वैसे-वैसे हम भी टायर को लकड़ी से रफ्तार देते आगे बढ़ते रहते थे। किसी के दाहिने तो किसी के बाए तरफ हम सभी के साथ टायर भी दौड रहा होता था।

अब गाड़ी छूट चुकी थी कभी इस खेत कभी उस खेत, कभी जीप आगे तो कभी टाटा सोमो, कही चौथे गेयर कि रफ़्तार, तो कहीं ट्रैक्टर में लगता हनुमान गेयर, वो सारी कहीं सुनी बातें गाड़ी से जूडि उन सभी बातों पर चर्चा और हमेशा एक दूसरे से आगे निकल कर मंजिल को सबसे पहले पाने कि होड। मानो जैसे ये सभी पंक्षी उन्मुक्त गगन के पिंजरो को तोड चले राहों को राहें बताने का ख्वाब लेकर, आज निकल पड़े हैं, क्षितीज़ कि सीमा नापने।

पी-पी, पो-पो, भूररररर-भूररररर, का शोर करते कभी नहर तो, कभी तालाब पर रूक कर डीजल और पेट्रोल भरा करते। अगर कोई साथी पीछे छूट जाये तो पगडंडियों के किनारे गाड़ी को पार्क करके इंतेज़ार किया करते थे। पलटन से कोई बीझड़े ना इसका पूरा ख्याल किया करते थे। मेडो पर भागते भागते यूं ही अचानक गिर जाते थे चोट भी लगती थी और खून भी बहता था पर घाव पर मीट्टी डालते हुए कहते थे "खूनवा मरि जाए, मीट्टी जी जाए" नारे को बार बार दोहराते थे अब वो अलग बात है कि समझदारी के इस दौर में घाव में मिट्टी डालना मना है।

दोपहर का खाना अक्सर बगीचे में लगे, आम के पेड़ों पर टंगे कच्चे आमों को तोड कर फिर नोखिले दांतों से काट कर, कभी नमक तो कभी नमक के बीना ही 'उममम' एक आंख को बंद कर स्वाद लेते हुए उसके खट्टे पन के साथ किया करते थे। और जैसे ही इसारा होता था कि बागीचे का रखवाला आ रहा है वैसे ही छटपट, टायर को कंधे पर टांगे और एक हाथ में आम और एक हाथ में लतेर कि डंडी पकड़े भाग पड़ते थे घर कि तरफ।

तब तक भागते, जब तक कि नज़रो के सामने घर नही दिख जाता था, फिर पीछे मुड़कर देखा करते कोई पीछा तो नहीं कर रहा। क्योंकि पकड़े जाने का डर और फिर बगीचे के मालिक के साथ साथ घर पर शिकायत होने पर जिसके हाथ लग जाओ उसके हाथ से ही प्रसाद पाने का सौभाग्य बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता था खुद के लिए।
"टायर ही जड है सभी समस्याओं कि सबसे पहले इसको जला दो!" खतरा इस धमकी का हकीकत में बदल जाने से ज्यादा था। क्योंकि पलटन में से एक मित्र का टायर उसके घरवालों ने पीछले सप्ताह ही तलाब में फेंक दिया था, जिसकी वज़ह से वो आज तक दूसरो की गाड़ियां ही चलाता नज़र आ रहा था, थाली के बैंगन कि तरह, बीना गाड़ी का ड्राईवर। और फिर हम उम्र के दोस्तों के ताने जो बर्दाश्त से बाहर होते थे, ऐसे हालातों में।

पीछे मुड़कर देखा तो सिर्फ अपनी पलटन के लोगों को ही पाया। सांस में सांस आई तो टायर को ज़मी पर रख दिया और कच्चे आम को दांत से काटते हुए, खट्टे पन कि वज़ह से एक आंख सरारत करती हुई बंद हो गई।
"बच गए यारों" वाली मुस्कान सभी को देखकर देते हुए एक दूसरे कि भागने कि झमता को आंकने लगते थे और वो जिसने सबसे पहले बगीचे वाले को देखा उसकी पीठ पर साबासी से थप-थपी कम, मार ज़्यादा पड़ती थी। और इसी के साथ ही 'कौन बनेगा कल का सरदार' के लिए दौड़ कि शूरूआती लाईन आज का सरदार खींच देता था।

नियम के अनुसार आज का सरदार दौड़ का हिस्सा नहीं होगा क्योंकि अंत में वही विजेता का नाम धोषित करता था। और इससे एक बात और तय थी कि कोई भी लगातार दो दिन सरदार नहीं बन सकता था। हम सभी इस टायर गाड़ी कि दौड़ जीतने वाले को एक दिन के लिए सरदार के नाम से ही पुकारते थे, क्योंकि यही एक मात्र तरिका था जितने वाले को पुरस्कारित करने का।

डंडा तैयार? "जी! सरदार" "टायर तैयार" "जी! सरदार"
"टायर गाड़ी तैयार?" "जी! सरदार"  "हो जाए?" "हां, हो जाए"।
"एक, दो, तीन, भागो!"

इतना सुनते ही टायर को आगे कि तरफ ज़ोर का धक्का और फिर लतेर कि लकड़ी से 'दे दना दन' 'मार दे भईयं' भरररररर करते हुए आगे निकलने कि होड लग जाती थी सरदार भी कंधे पर टायर टांगे और लकड़ी पकड़े हाथों में,  दौड़ से बाहर पर दौड़ पर नज़र बनाए हुए सबसे आगे भाग रहा होता है।

देखते ही देखते सूर्य कि तपती हुई किरण से सूखते गले को और माथे से टपकते पसीने को ध्यान न देते हुए, मंजिल पर निगाहें हुआ करती थी क्योंकि दौड़ सिर्फ एक सीट के लिए था और जैसे ही सबसे पहले वहां कोई पहुंच जायेगा दौड़ खुद ब खुद उस दिन के लिए खत्म हो जायेगी। और ऐसा ही हुआ हमेशा कि तरह आज मैं फिर से मंजिल पर पहुंचने से पहले ही रूक गया था क्योंकि अगले दिन का सरदार दौड़ को जीत चुका था और मैं तीसरे स्थान पर था। जिसके लिए कोई भी स्थान और पुरूस्कार नहीं था।

चेहरे कि मुस्कान और पलटन में से किसी के सरदार बनने पर खुशी कि लहर में हम भी दौड़ पड़ते थे उसकि तरफ और फिर तीन लोग एक दूसरे के हाथों को पकड कर बनाते थे सरदार के लिए पालकी और फिर एक सूर में वो सभी मासूमियत से भरि लड़खड़ाती आवाज़ें शोर करती थी,
"हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की"।

ऐसे ही चिल्लाते,बुलबुलाते,फुलफुलाते अपने-अपने घर को निकल जाते थे, कंधे पर एक टायर टांगे और हाथ में लतेर का डंडा लिए। साथ ही साथ यह कहते हुए कि शाम को बर्फ मैं बनूंगा और बाकि सब पानी।

कितना खूबसूरत था वो बचपन चिड़ियों में लगी गगन कि सीमा नापने वाली होड कि तरह। याद आता है वो विलुप्त हुआ बचपन जब एक डंडा एक टायर कि जगह आज एक चार्जर एक मोबाइल देखता हूं बच्चों के हाथ में।