मैं अक्सर अपने धर का दरवाज़ा जल्द बाज़ी में बंद करता हूं इसका एक अहम कारण शायद मेरी नींद का है जो कि विदेशीकरण के दौर में अब उनके 'टाईम ज़ोन' के अनुसार ही आति है।
दरवाज़ा बंद करते ही पैरों कि रफ्तार इतनी तेज़ होती है कि पता ही नहीं चलता उस रास्ते में बैठे तमाम लोगो के चेहरों का जिनकि आवाजें हमेशा कहती हैं "बाबूजी कुछ दे दो खाने के लिए" और बच्चों का ढेर सारा शोर "दीदी,भईया मुझे भी देदो एक और समोसा" मेरी गर्दन का झुका होना और आंखों का जमीन पर होना बस उनके नंगे, सर्द कि वजह से फटे हुए पैर ही देख पाता हूं, शायद उन सभी के चेहरे पर बेबशी और मासूमियत को देखने कि हिम्मत नहीं मुझमें जिसकी वजह से गर्दन ऊपर नहीं उठा पाता हूं।
उन सभी कि आवाज़ों में मेरी भी आवाज निकलती है "रिक्शावाले!!" भईया रूको!
'रूका ही हुआ हूं, बाबूजी आईये' रिक्शावाला।
मेट्रो स्टेशन चलोगे?
'जी, बैठिए बाबूजी' रिक्शावाला
कितना रूपया लोगे?
'जितना आप प्यार से दे देना, 10 रूपये से 20 रूपये तक' रिक्शावाला
10 देंगे
'ढीक है' रिक्शावाला
"अच्छा तो मैं अब चलती हूं बच्चे यही रहेंगे मंदिर के सामने आते जाते नज़र रखना" जल्द बाज़ी में निकले यह भावनात्मक शब्द जो कि कुछ पल के लिए अवकाश मांग रहे थे, वो शायद उसकी पत्नी थी।
रिक्शे पर अपना दहीना पैर रखते हुए अब मैं बैठ चूका था और रिक्शेवाले ने लाल रूमाल को अपने सर पर बांधा और आसमान में बादलों और शर्द ऋतु कि चादर ओढ़े सूर्य को देख दोनो हाथों को जोड़कर, होंठो से कुछ बुदबुदाहट सी कि और फिर उसने रिक्शे के पैंडल पर धीरे से ज़ोर लगाते हुए, उसके एक खिझ से भरी चीख के साथ रिक्शा आगे बढ़ा।
हमेशा कि तरह अब मेरा ध्यान सड़कों के किनारे आते जाते लोग, समान बेचने वाले और खंभों पर टंगे पोस्टरो पर था।
'राजनीतिक करण हो चुका है समाज का क्योंकि अब चुनाव जो आने वाले हैं" कुछ ऐसे विचार मन ही मन उबलना शूरु हो गए थे कि इतने में झटका सा लगा और मैंने रिक्शे कि दोनों लोहे कि पत्तरि को अपने दोनो हाथों से कस कर पकड़ लिया ताकि मैं गिरु ना।
'ऐसे कैसे अचानक से ब्रेक लगा रहे हो! भाईया' घबराहट में मैंने तेज़ी से कहा।
ब्रेक नहीं मारते तो आज या तो हम या वो अस्पताल पहुंचे होते, आजकल के नौजवान कैसे केसे मोटरसाइकिल चलाते हैं राम ही जाने।
मैंने भी हम्ममम करते हुए कहा चलो कोई नहीं आगे बढ़ते हैं।
माता का मंदिर के सामने छड भर के लिए फिर रिक्शा रूका और इस वारि मैं चौकन्ना था, ब्रेक भी आराम से लगी थी,
'बाबूजी दो मीनट! मैं अभी आया'
मेरी नज़र रिक्शेवाले पर थी और अंदर ही अंदर मैं परेशान भी हो रहा था इस डर से, कि कहीं आज भी मैं दफ्तर के लिए देर ना हो जाऊ, क्योकि खासकर कि चुनाव के माहौल में काम कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ होता है दफ्तर में। रिक्शेवाला पन्नी से निकाल कर रोटियां मंदिर के सामने खड़ी गाय को खिलता है और फिर पानी कि बोटल को भर कर बाहर से ही मंदिर के अंदर विराजमान देवी को प्रणाम करता है उसे देख कर मैं भी दिल पर दाहिना हाथ रख कर सिर झुका देता हूं उस देवी के सामने।
शायद मैं आज दिन का उसका पहला ग्राहक हूं, इतना अंदाजा मुझे हो ही गया था उसके इस व्यवहार से।
मेरा अब पूरा ध्यान उस रिक्शेवाले पर था वो जैसे ही हाथों से रिक्शे का हैंडल पकड़ता है उसकी उभरी हुई हाथो कि नशे और चमड़े पर पड़ी झूर्रियां, उसके प्रतिदिन, दिन को जीने के लिए कि जा रही कड़ी मसक्त को बया कर रही थी।
मैंने ध्यान दिया तो पता लगा कि उसने एक पतली सी सफेद रंग की धोती और बदन पर उपर से स्वेटर पहन रखा था जिसमें हुए छोटे छेद मानो शर्द से हाथ मिलाकर उसके शरीर को कंपकपाने के लिए मज़बूर किए जा रहे थे। कानो को बचा रही थी उसकी लाल पगड़ी।
उसके मुंह से आती शू शू कि आवाज़ ही काफी थी यह बताने के लिए कि शर्द भरी सुबह ने उसे जकड़ लिया था।
ठंड कुछ ज्यादा ही लग रही है क्या भईया' कैसा बेतुका सवाल था मेरा यह
नहीं बाबूजी जी बस थोड़ा-सा है, बाक़ी रिक्शा चला रहे हैं ना, गर्मी खुद बा खुद आजायेगी आप चिंता ना करें।
चेहरे पर मेरे जैसे सहानुभूति से भरि मुस्कान आ गई।
इतने में मोबाईल बाइब्रेट होता है
"टीम एडवाइज़ टू गो इंडिया गेट फाॅर कवरेज"
राहत कि सांस के साथ एक बार फिर से रिक्शा रूक गया था और अबकी बार किसी विधायक प्रत्यासी कि रैली गुज़र रही थी, रिंग रोड से जिसकी वजह से पूरी सड़क पर जाम लग चूका था। मुझे अब जल्दी ना थी तो मैं भी आराम से सांस भरते हुए रिक्शेवाले भईया से पूछा कि "अब कि बार किसकी सरकार?"
हम कौन होते हैं सरकार बनाने वाले और सरकार बन भी गई तो हमारा क्या ही हैं कल भी ऐसे थे और आज भी।
आप ही के लिए तो सरकार है?
क्या सरकार कहा कि सरकार विधायक जी सफारी से उतरे तो हमारा ख्याल रखेंगे ना!
गरीब और हम जैसे झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों के लिए क्या बिजली का बिल और क्या पानी का बच्चे मंदिर के सामने है, तो वही पत्नी घर-घर में झाड़ू पोछा लगाती है मेहनताना बढ़ने की जगह कम ही हो रहा है उसका और मैं यहां दिन भर रिक्शा चलाता हूं और आजकल तो पता नहीं क्या हो गया है कि सभी को रिक्शा से परहेज सा हो गया है वो ₹10 खर्च करने को तैयार ही नहीं है और कोई यह भी नहीं समझता कि उसके ₹10 मेरे प्रतिदिन दिन को जीने के लिए बहुत जरूरी है। यह रिक्शा भी मेरा खुद का नहीं है रोजाना ₹300 तक मालिक को देना होता है।
और तो और बाबूजी, गरीबी में आटा गिला हुआ पड़ा है।
आप सभी अपने अपने सपनों की दुनिया जीने वाले हममे तो हिम्मत ही नहीं होती कि कभी अपने बेटा बिटिया के सपनों को पूछ ले। बचपन में हम पुलिस में भर्ती होकर चोरों को पकड़ना चाहते थे पर काबिलियत उस दीन पैसो के सामने हार गई थी और अब लगता हैं कि यह जिंदगी भी हार जायेंगे अगर ऐसा ही रहा तो।
कल ही डब्ल्यू भाई बता रहे थे कि कुछ मंदी की मार आई है देश में जिसकी वजह से हमारा 10 रूपया बंद हो गया है। अब पता नहीं कब यह मार खत्म होगी और फिर से सभी सवारियां रिक्शे पर सवारी करती हुई मेट्रो स्टेशन तक जाएंगी। बाबूजी आप ही बताइए कि आखिर कब खत्म होगी यह मंदी की मार?
मैं उसे क्या ही जवाब देता पर बस इतना जरूर कहा कि इस मंदी की मार ने सभी को मारा है हम भी आपके साथ ही है।
रैली अब कुछ दूर आगे निकल गई थी जिसकी वजह से रास्ता खाली हो गया था और अब हम धीरे-धीरे से मेट्रो स्टेशन के पास पहुंच चुके थे।
रिक्शा से उतरने के साथ ही मैंने जेब से ₹30 निकाले और रिक्शावाले के हाथ में रख दिए पहले तो उसने मना किया पर समझाने पर समझते हुए रख लिया और मैंने भी उसे भरोसा दिया कि कल सुबह दोबारा मुलाकात होगी।
किस तरीके से गिरती हुई अर्थव्यवस्था से ना ही सिर्फ मध्यम और उच्च वर्ग के लोग परेशान होते हैं अपितु समाज का सबसे गरीब तबका थी इसकी मार को झेलता है।
एक छोटी सी गुफ्त़गु उस रिक्शेवाले से पूरे देश की अर्थव्यवस्था को समझा गई, उम्मीद है कि आप सभी भी ऐसे समय पर इस वर्ग का साथ नहीं छोड़ेंगे।