शनिवार, 7 मार्च 2020

मैं तुम्हारे हाथ पर बंधी घड़ी हूं!


मैं कश्मीरी गेट के स्टेशन पर खड़ी मंडी हाउस की तरफ जाने वाली मेट्रो का इंतजार कर रही थी और जैसे ही मेट्रो आती है बिना किसी देरी के मैं मेट्रो के अंदर बहुत ही आसानी से पहुंच गयी।

मुझे बहुत सारी भीड़ दिखी और फिर अचानक अंधकार सा छा गया मेरी आंखों पर।  कुछ दिखाई नहीं दे रहा था सिर्फ काली रोशनी के सिवा। शायद यह मेरी आशावादी सोच का ही नतीजा है जो अब मैं उस भयानक अंधकार को भी काली रोशनी का नाम देती हूं।

पूरा अंधकार ही अंधकार था ना ही मुझे कोई देखने वाला था और ना ही मैं किसी को देख पा रही थी। मैं चिल्ला रही थी शोर भी मचा रही थी पर शायद मेरा शोर किसी को सुनाई नहीं दे रहा था तभी तो कोई भी पलट कर जवाब नहीं दे रहा था मुझे बचाने के लिए इस भयानक अंधकार से।
हमेशा की तरह आज भी एक छटपटाहट थी दिल में कि जिस काम के लिए मुझे पिरोया गया कहीं ना कहीं आज के  इस दौर में, मैं वह काम करने में सक्षम नहीं रही। इन्हीं सारी बातों को अपने मन में दोबारा और बार बार सोचती हुई मैं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि कब मैं इस अंधकार से बाहर निकलू और जितने भी हम राही साथ में सफर कर रहे हैं, उनको सही समय बता सकूं।

और जैसे ही मेरे कानों में आवाज आई 'अगला स्टेशन आईटीओ है दरवाज़ें दाईं तरफ खुलेंगे कृप्या सावधानी से उतरे' और इन्हीं शब्दों के साथ मैं उसके हाथ से लिपटी हुई जे़ब से निकलकर बाहर की तरफ आ गई थी।

अब मैं बाहर थी एक चैन की सांस के साथ, उस भयानक अंधकार से, पर क्या ही फायदा! यह उजाला भी मेरी आवाज़ को नहीं सुन रहा था। वही आवाज़ जो मेरी तीन पंखुड़ियों के चलने से होती है।

मेरी तीन पंखुड़ियां कभी भी आराम नहीं करती शिवाय जब मेरी आत्मा ना खत्म हो जाए। सबसे बड़ी पंखुड़ी जिस पर परिवार की सभी जिम्मेदारी है सबसे ज्यादा काम के साथ सबसे ज़्यादा आवाज़ करती है। उसके बाद दूसरी पंखुड़ी वह धीरे-धीरे ही चलती है पर उसके बिना सब कुछ अधूरा सा लगता है वही तो है जो बड़ी और छोटी पंखुड़ी को आपस में जोड़ कर रखती है ताकि दोनों का मतलब और महत्व खत्म ना हो।

सबसे छोटी पंखुड़ी स्वभाव में सबसे शांत पर महत्वपूर्णता में सबसे ज्यादा महत्वमान है। काम बहुत कम करती है और बहुत ही धीरे धीरे चलती है। मानो जैसे उसे जिंदगी में आगे बढ़ने का कोई लालच ही ना हो या फिर उसे पता हो कि घूम फिर कर उसी गोल सी दुनिया में ही घूमते रहना है। आखिरकार  कितनी समझदार है ये छोटी पंखुड़ी।

और फिर मेरे पूरे बदन को जकड़े हुए मेरी जड़े। हां वही जड़े जो कहीं ना कहीं मेरी निशानी हैं, जिनको मेरे पूर्वजों ने कमाया है, तप, त्याग और प्रतिज्ञा से शायद अगर वह ना हो तो मैं आप सबके हाथों में भी ना बंध पाउ‌।

माहौल और भीड़ वैसा का वैसा ही था। कुछ यात्री बदले थे तो कुछ यात्री वही कश्मीरी गेट वाले ही थे। जिनकी निगाहें अभी भी तशरीफ़ रखने के लिए मेट्रो में सीट खाली होने का इंतजार कर रही थी।

मेट्रो का दरवाज़ा खुलता है कुछ साथी नए आते हैं तो कुछ अलविदा कह कर निकल जाते हैं मैं सबको बड़े ही ध्यान से देख रही थी पर कोई मुझ सा नहीं था सब के सब अलग अलग खानदान के प्रतीत हो रहे थे पर सभी का काम सामान्य ही था, समय बतलाना।

आधुनिकता के इस दौड़ में मेरी वह सहेली सबको लोकप्रिय थी जिसकी कोई भी पंखुड़ी नहीं थी और फिर भी सही समय के साथ लोगों के दिल का हाल भी बतलाती थी।
रूप बनावट वेशभूषा चाहे जितनी अलग क्यों ना हो पर हम सभी का मकसद एक ही था, और एक ही नाम के पर्यायवाची थे।

मुझे अक्सर लोग कोसते हैं गाली देते हैं मेरे स्वभाव की वजह से। समय समय की बात करते हैं और जब समय निकल जाता है, तब इसमें मेरा क्या दोष मैंने तो हमेशा से ही आप सभी को सही समय बताने का काम किया है अब यह आप पर है कि आप मेरे इशारों को पहचानते हैं, मानते हैं, या नहीं।

चलिए छोड़िए जाने भी दीजिए इस छोटी सी उम्र में मैं क्या ही आप सब से शिकायत करूं अपने दिल की। दिमाग से बस इतना ही कहना चाहूंगी कि अगली बार जब भी मुझे अपनी कलाइयों पर बांधना तो एक चुंबन जरूर देना मुझे ताकि मुझे भी, यह अहसास हो सके की, 'है तुम्हें एहसास मेरा भी, कि मैं तुम्हारी कलाइयों पर बनी घड़ी हो'।

'अगला स्टेशन मंडी हाउस है दरवाज़ें दाई तरफ खुलेंगे, यात्रियों से अनुरोध है कि अपना समान ले जाना ना भूलें'

मैं उसके हाथ पर बंधी मेट्रो के दरवाजे खुलते ही अब प्लेटफार्म पर आ चुकी थी वहां पर मैंने लोगों को यह कहते सुना कि 'मेरा तो समय ही खराब चल रहा है' मुझे बड़ा दुख हुआ, कि मैंने ऐसा क्या गलत कर दिया कि जो मैं समय को सही से चला नहीं पाई या समय को सही से तुम्हें बता नहीं पाई। जिसकी वजह से तुम्हारा समय खराब चल रहा है क्या तुम्हारा भी समय खराब चल रहा है?

मैं यूंही तुमसे मिलने दूबारा आउंगी अपनी बात रखूंगी जो कि तुम्हारी बातों से ही। मुझे अपनी कलाई पर बांधना मत भूलना क्योंकि मैं ही तो हूं जो तुम्हें समय-समय पर समय कि याद दिलाउंगी। 

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