गुरुवार, 22 अगस्त 2019

"सीमा पार से खत"

 देश कि आजा़दी और बटवारे को हुए अभी २३ वर्ष ही हुए थे। हम पाकिस्तान से आये उन सर्णाथियो मे से थे जिनके सीमा के इस तरफ और उस तरफ , दोनो ओर जानने वाले थे , और बीना किसी जान-मान कि हानि झेले हम रेलगाड़ी मे भूसे कि तरह भरकर लाहौर से दिल्ली के दरयागंज इलाके मे आ कर रहने लगे थे। माँ ने मुझे बताया था कि उस समय मेरी आयु २ वर्ष कि थी और मै बहुत ही सरारती, नटखट और मै हमेशा ही रूक्सार के साथ ही लडता खेलता और हो भी क्यों ना आखिरकार वो मुझसे एक वर्ष की ही तो ज्येष्ठ थी। उनके अब्बाजान ने हमारे परिवार को दंगिय लोगो से बचा कर सुरक्षित स्टेसन तक पहुंचाने मे काफी मदद की थी और अल्लाह हाफिज अपने अंतिम शब्दो से हमारे परिवार के लिए दुआ मागते हुए जैसे-जैसे रेलगाड़ी आगे बढी वो भी आँखों से ओझल होते गए।

शाम के आठ बजे थे और बाबूजी जी के घर आने का वक्त हो गया था, जो कि हमेसा अपने सीमा पार घर,बैल,भैंसे और खेत-खलिहानों कि बाते अक्सर मुझे बताया करते थे । और अफसोस बस इतना था उन्हें कि वो उन सभी को अपने साथ लेके नही आ सके और यहाँ पूरानी दिल्ली कि नई सड़क पर एक छोटी सी पुस्तक भंडार मे ही अपनी सभी इच्छाओं को दफ़न करके रहना पडा उन्हें। कई बार बाबूजी ने सीमा उस पार रूक्सार के अब्बा को ख़त लिखा परंतु हर बार कोई उत्तर नही आया और बाबू जी ने अपना ९३वां आखिर पत्र लिख कर सब कुछ भगवान के लिए छोड़ दिया। बाबूजी कि आँखे अक्सर मुझे कही और ही गुम नज़र आती थी।
मै और मेरी छोटी गुडिया , सुषमा जो कि आजा़द भारत मे जन्मी इस बार उसकी बोर्ड कि परीक्षा थी। और मै आई.आई.एम.सी. से, पत्रकारिता के लिए आवेदन दिया था। दोपहर का ही समय रहा होगा जब डाकिये वाले ने बाबूजी का नाम पूकारा और संयोग तो देखो बाबू जी बस अभी आये ही थे दुकान से दोपहर का भोजन करने। बाबूजी को विश्वास ना रहा कि सदियों तक इतंजार किया जीस अवाज़ का वो आज आया यू मुहाने, " अरे सुनती हो डाकियाँ आया हैं , पानी और मिठा लेके जल्दी आओ" ऐसा कहते हुए बाबूजी दरवाजे कि तरफ चल पडे। कुछ ही छंद समय मे दरवाजा का साह से टकरा कर बंद होने कि आवाज़ आई और फिर बाबूजी दबे पाँव घर के अंदर आये और इतने मे माँ भी उपर कि मंजिल से हाथ मे पानी और गुड लिये सर सर करती हुई सिढियो से निचे चली आई थी। बाबूजी जी ख़त को मेरे हाथो मे देते हुए , और माँ कि तरफ देख कर कहा कि आज रात के भोजन मे मटर-पनीर और पुडियाँ बनाना क्योंकि हमारे लाडले का दाखिला आई.आई.एम.सी मे हुआ हैं , साबासी देते हुए मुझे गले लगा लिया।
मुझे ऐसा एहसास हुआ कि जैसे बाबू जी के अदंर ही अंदर उनका वर्षों का इतंजार ख़त के लिए आज खत्म ही नही मर सा ही गया हो , चेहरे पर खुसी से छुपी हुई अंदर के दर्द कि वो आस "सीमा पार से उस खत कि"|
बाबूजी, दोपहर का भोजन करके दुकान कि तरफ निकल गये। और माँ अपने कामो मे सुषमा को लेकर व्यस्त हो गई।
अगले दिन कि सुबह ही मैं और बाबूजी आई.आई.एम.सी जाके अपने दाखिले कि रकम देके अपना स्थान उन सभी भाग्य साली साथियों के साथ आगे कि पढाई के लिए सुनिश्चित किया । और फिर एक सप्ताह के बाद अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन कि कक्षाओं मे दिनप्रतिदिन आना जाना शुरू हो गया।
लिखते, पढते, हसते-हसाते कब विदाई कि दिन आ गया पता ही ना चला पर इतना जरूर पता चला कि पत्रकारिता एक ऐसी विशेष गली हैं जहाँ सभी के पास अपनी अपनी प्रतिभा हैं मगर इसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं आपका कोई अपना सीमा उस पार होना जो आपको पनाह दे सके आपकी पत्रकारिता के जज्बातों को दिखाने के लिए । कई जगह गया मै लेकिन किसी ने भी इस हुनर को कागज़ और कलम नही दिया और तकरीबन दो महीने यहाँ वहाँ भटकने के बाद , मै हताश होकर रोने लगा , उस बडे से अंधकार को देख  कर जो कि मेरे सामने था और मै कही इस भीड कि रफ्तार में खुद को खोया हुआ महसूस करने लगा था।
जून से घर पर खाली बैठे बैठे अक्तूबर का महीना आ गया था और मैं आज भी नौकरी कि तलाश मे इधर से उधर अपनी पनहीं को घिसता रहा। और प्रेमचंद्र कि तरह ही समाज की सभी बुराइयों को अपने पैर का अंगूठा दिखाता रहा। बाबूजी और माँ का एक ही सवाल मेरी सभी शामो को एक अर्षे से बर्बाद करती हुई आ रही थी. अगर मां कहती "बेटा गुडियां कि शादी और हमारे मरने से पहले तूझे कही नौकरी मिल जाये तो भगवान का रहमो करम हो हम पर" तो वही बाबू जी
"अरे इसने कुछ पढा लिखा नही शहर कि चौका चौध मे गुम हो गये हैं जनाब, पढे लिखे अनपढ बेरोज़गार कहते है ऐसे लोगो को , बेहुदा कही का , जब कुछ मिल जाये तभी अपनी बद् सूरत थोपडा दिखाना, इतना पैसा लगा दिया अब और कि उम्मीद ना रखना".
मैं बस सुबह सबेरे यही प्रथान करता था कि कही से कोई आये इस कलयुग पापी दुनिया मे जो मेरी मेहनत के साथ इंसाफ कर सके।
बाबूजी घर पर दोपहर का खाना खा ही रहे थे कि इतने मे किसी ने दरवाजे पर दस्खत देते हुए उनका नाम पूकारा, दरवाजा खोला तो पता लगा कि डाकिया ख़त लेके आया हैं। ऊपर लिफाफे पर ही पाकिस्तान पोस्ट कि मोहर भी साथ मे एक नाम जिससे मै अनजान था पर मैने जैसे ही उस नाम को ज़ोर से पढा तो बाबूजी खाना खाते खाते ही उनके मुँह से अल्फा़ज निकला "भाई-जान" और खाने खाते हुए जब तक खाना खत्म ना हो ना उठने कि खुद कि परम्परा को तोडते हुए दौड़ पडे ख़त कि तरफ ।
आज वह झूर्रिदार चेहरा जिसमे उनकी आँखे गडी सी दिखती थी उस खत को स्पर्श करते ही भर भर कर आँसुओं से बहने लगी। आज दिल कि धडकनों से तेज़ उनके हाथ काप रहे थे ज़ूबान तो जैसे जख्त थी इबादत मे जिस तरह ज़ुबान हिलती हैं बस उसी अदहब से एक टक मे बाबू जी उस खत को पढते रहे और फिर उसे दिल से लगाकर के बैठ गये बच्चों कि तरह जमीन पर आलथी पालथी मारकर ।
और माँ कि तरफ देखते हुए कहा कि आज रात को खाने मे मटर पनीर बनाना और साथ मे ईद वाली सेवाईयां । ख़त मे एक दरयागंज का पता था जिनसे मिलने और उनकि खैरियत के बारे मे लिखने के लिए गुजा़रिश कि थी रूक्सार के अब्बाजान ने , और अगले ही दिन हम उस पते पर निकल पडे। बाबूजी, आगे-आगे और हम उनके पिछे-पिछे। उस पते पर पहुंचे तो पता लगा कि वहां अब उस नाम का कोई व्यक्ति नही रहता पर जिन्होंने वो घर खरिदा था उनसे पता लगा कि वो परिवार अब अशोक विहार मे रहने के लिए चला गया हैं । वहाँ से पता लेकर अशोक विहार का , हम बस से निकल चले उनकी तलाश मे।
दरवाजे पर दस्तखत देते हुए बाबूजी ने पठान साहब! पठान साहब! कि आवाज़ लगाई और सामने से बुढापे कि तरफ बढ रहे एक चुस्त दुरुस्त लाल दाढी वाला व्यक्ति आया और हमे देखकर दरवाजा खोले बगौर ही जाँच पडताल शुरू कर दी।
सब लोग अनजान थे एक दूसरे से पर ख़त जो सभी किरदारो को समेटे हुआ था। बाबूजी ने बीना किसी देरि के वो खत उनको थमा दिया। और कुछ ही देरि मे दोनो जगहो से गंगा कि धारा निकल पडी. "बैर कराते मंदिर मस्जिद मेल कराता ये ख़त आज एक नया इतिहास लिखने को तैयार था" । आप पास के लोग एक तरफ खड़वा चंदन धारी , हाथ मे भगवा रंग का धागा बांधे और दूसरी तरफ पढानी कुर्ता , सर पर गोल टोपी का एक दूसरे से गले लग लग कर रोना मानो सभी को कुछ छड भर के लिए एकस्त कर दिया हो।
पठान साहब, अकेले ही थे १९४७ के बाद से ऐसा इसलिए था क्योंकि वो उन मुसलमानों मे से थे जिन्होंने भारत ना छोड के जाने का निश्चय किया था। हमे बताते हुए उन्होंने बताया कि घर मे उनकि बेगम और बहन साथ मे रहा करती थी पर उस दिन जब शाम को पठान साहब पत्रकारिता करके घर पहुंचे तो उनका घर विरान हो चुका था अगर कुछ दिखा भी तो लाल लाल खून से रंगी दिवारे और सुबह वाले कपडे जो कि पठान साहब कि बेगम और बहन के शरीर पर थे फटे चीटे हालात मे खून से सने हुए यहाँ-वहाँ बिखरे हुए थे। पठान साहब ने इसकी शिकायत भी दर्ज करवाई लेकिन ना वो दरिंदे मिले और नाही उनके अपने प्यारे । दिल मे उस दरयागंज कि दरिंदगी कि याद लिए पठान साहब यहाँ अशोक विहार मे रहने लगे।
और फिर खाने के बाद बाबूजी ने अपना पूरा हाल कहा। मेरे बारे मे बताते हुए बाबूजी ने कहा कि "पठान साहब ये हमारे बडे बेटे है जो बेरोजगार हैं पर हुनर और सहनशीलता की कमी नही पर क्या करे घर पर ही बैठे है, आप के नक्शे कदमो पर ही हैं अब आप ही कुछ इनकी मदद कीजियेगा"। इतने मे पठान साहब बोल पडे कि "अब तो ये मेरा बच्चा भी हैं , और एक पत्रकार के बच्चे को कोई भी पत्रकार बनने से नही रोक सकता और अगर कोई रुकावट आई तो अब वह अल्लाह को प्यारी हो जायेगी", और तुरंत ही उन्होंने एक कागज़ पर एक पता और नाम लिखते हुए मुझे वहां आने वाले बुधवार को जाने को कहा।
शाम का वक्त हो चला था , बाबूजी अपने घर का पता पठान साहब को देते हुए उनके आने का आग्रह किया और अब हम अपने घर कि तरफ निकल पडे।
बुधवार, के दिन मैं पठान साहब के बतलाते पते पर पहुंचा और हमेसा कि तरह अपना साक्षत्कार दिया और उन्होंने कहा कि परिणाम कि घोषणा कुछ दिनो मे आपके पास ख़त द्वारा मिल जायेगी।
एक दिन बीता  दो दिन बीते  तीन दिन बीते और आज चौथा दिन था पर अब तक ना ही कोई डाकिया और ना ही कोई ख़त नसीब हुआ था । अचानक पंडित जी पंडित जी  कि आवाज़ मेरे कानो से टकराई और मालूम हुआ जैसे ये जानी पहचानी पठान साहब कि आवाज हो। और हा यकीनन वही दरवाजे पर अपने हाथो मे खत लिये खडे थे । होठो पर हंसी और अपने किये हुये वादे को पूरा करके मौदान फतेह करने वाली मुस्कान । उनके पैरो को स्पर्श करते हुए , उनका स्वागत किया। माँ आई और पाठन साहब का स्वागत करते हुए मिठा पानी दिया और मुझे बाबूजी को बुलाने के लिए भेज दिया।
बाबूजी हमे रास्ते मे ही मिल गये और हम सेवईयाँ खरिदते हुए घर पहुंचे जहा गुडिया पठान साहब के साथ तत्कालीन भारत के हालातो को लेकर एक गहन बीचार कर रही थी और करे भी क्यों ना अब उसे आई.ए.एस. अधिकारी जो बनना था।

धन्यवाद साथियों , मुझ जैसे लेखक कि कलम से लिखे अक्षरो को आपना महत्वपूर्ण समय देने के लिए।







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